पर्यावरण का भार मूझपर
जंगल का मै वासी हॅू।।
कुदरत का वरदान मै
प्रकृती पुत्र आदिवासी हॅूं।।
जंगल काट ब्रीज बनाया
खलीहान मे दफ्तर आया
शैकडो पेड देखते रहे मुझे
अंगुठा छाप ठप्पा पाया।।
बाबजूद इसके खामोशि से
हमने सबका मन बहेलाया
कला से घर आंगन सजाकर
नृत्य नाट्य उन्हे दिखलाया।।
एक दिन खूद मे झांका,.....
भिन्न भिन्न रिवाज मेरे
भिन्न मेरी भाषा....
अक्षरों की पहेचान करू तो
मिल सकती है नयी आशा।।
वनरक्षा के साथ
भार उठाया शिक्षा का
पढा लिखाकर सुखी करूंगा
उठाया बिडा रक्षा का।।
नही हूं मै अब कम किसीसे
पहेचान मैनै भी पाई है।।
दरबार दरबार पहेचान मेरी
शिक्षा मेरे व्दार भी आई है।।
वनसंपत्ती का मालक मै
प्रकृती का वासी हूं
पर्यावरन का संऱक्षक मै
प्रकृती पुत्र आदिवासी हूं।।
रेशमा जावेद शेख
प्राथमिक शिक्षिका
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