बचपन मिलता एक बार मुसाफ़िर
आयेगा ना फिर कभी,
जी ले चाहे जितना इसको
बच्चा बनेगा ना फिर कभी!
ढेरसा मिलता प्यार भाई
मां बांप और अपनों का
बितते जाते सुहाने दिन वे
चिंता ना डर सपनों का!
कभी साथीयों के संग
खेले झूले अमराई में,
मस्ती करते तभी भरे जी
मार भी खाते बदमाशी में!
वो भी क्या दिन थे यारों
बचपन के सुहावन प्यारे,
जंगल झरनें खेंत पहाड़ी
घुमकर आतें नदी किनारें!
मां प्यार से हमें बुलाती
आ जा बेटा खाना खा,
जी भरकर खूब खेलना था!
गए साथियो वो सुनहरें पल
अब कहां वो सब बातें,
अब बस पढ़नी हमें है
बचपन की यादो भरी किताबें!
मोबाईल ने घर पर ही अब
बचपन से बुढ़ापा लाया है,
अब तो भैय्या ऑनलाईन ही
शादी करने का यूग आया है!
बच्चों का तो भविष्य ही अब
ख़तरों का खिलाडी बन गया,
मांबाप से मेरी यहीं विनंती
नन्हों का जीवन संभालो भैया!
कवयित्री कलावती कोल्हटकर, गोंदिया
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